Tuesday, 11 April 2017

" शेर-ए-ख़ुदा हज़रत अली रज़िअल्लाहु तआला अन्हु "

इस्लाम में इस बात पे हमेशा से जोर दिया गया है कि महापुरुषों ,पैगम्बरों, नबियों और इमाम को हमेशा किसी न किसी अवसर में याद किया करो जिससे उनके किरदार को आज का नौजवान समझे और खुद को संवार के एक बेहतरीन इंसान बना सके | इसी लिए अक्सर मुसलाम माहापुरुशों के जन्म दिवस पे ख़ुशी और म्रत्यु में दुःख प्रकट कर के उनको याद करता है | 


यह रमजान का मुबारक महीना है जिसमे हर इंसान यही कोशिश करता है की गुनाहों से बचे और साल भर में यदि कोई बुरी आदत पद गयी हो तो उस बुराई को इस महीने में खुद से दूर कर सके | लेकिन इसी महीने की १९ तारिख को मुसलमानों के खलीफा हजरत अली (अ.स) को अब्दुर्रहमान पुत्र मुलजिम नाम के व्यक्ति ने उनपे तलवार से हमला उस समय किया जब वो अल्लाह के आगे सजदे में थे |गया तथा दो दिन पश्चात रमज़ान मास की 21 वी रात्री मे नमाज़े सुबह से पूर्व आपने इस संसार को त्याग दिया। 


हजरत अली (अ.स) का किरदार इतना बलंद था की जब उन्होंने तीन दिन बिस्तर पे रह के दुनिया छोड़ दी और उनको दफन के लिए ले जाया जा रहा था तो गरीबों के मोहल्ले से किसी ने पुछा यह कौन था और जब लोगों ने बताया की यह हजरत अली(अ.स) थे और तीन दिन बीमार रह के दुनिया से चले गए तो वो सारे गरीब रूने लगे की हाय अब उनका क्या होगा यही तो था जो रोज़ उनके घरों में अनाज रात के अँधेरे में पहुँचाया करता था | 

यह वही अली (अ.स) थे जो कहा करते थे कि मेरी रचना केवल इसलिए नहीं की गई है कि चौपायों की भांति अच्छी खाद्य सामग्री मुझे अपने में व्यस्त कर ले या सांसारिक चमक-दमक की ओर मैं आकर्षित हो जाऊं और उसके जाल में फंस जाऊं। मानव जीवन का मूल्य अमर स्वर्ग के अतिरिक्त नहीं है अतः उसे सस्ते दामों पर न बेचें। हज़रत अली का यह कथन इतिहास के पन्ने पर एक स्वर्णिम समृति के रूप में जगमगा रहा है कि ज्ञानी वह है जो अपने मूल्य को समझे और मनुष्य की अज्ञानता के लिए इतना ही पर्याप्त है कि वह स्वयं अपने ही मूल्य को न पहचाने। 



हजरत अली (अ.स) ने अपनी खिलाफत के समय अद्धितीय जनतांत्रिक सरकार की स्थापना की। उनके शासन का आधार न्याय था। समाज में असत्य पर आधारित या किसी अनुचति कार्य को वे कभी भी सहन नहीं करते थे। उनके समाज में जनता की भूमिका ही मुख्य होती थी और वे कभी भी धनवानों और शक्तिशालियों पर जनहित को प्राथमिक्ता नहीं देते थे। जिस समय उनके भाई अक़ील ने जनक्रोष से अपने भाग से कुछ अधिक धन लेना चाहा तो हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने उन्हें रोक दिया। उन्होंने पास रखे दीपक की लौ अपने भाई के हाथों के निकट लाकर उन्हें नरक की आग के प्रति सचेत किया। वे न्याय बरतने को इतना आवश्यक मानते थे कि अपने शासन के एक कर्मचारी से उन्होंने कहा था कि लोगों के बीच बैठो तो यहां तक कि लोगों पर दृष्टि डालने और संकेत करने और सलाम करने में भी समान व्यवहार करो। यह न हो कि शक्तिशाली लोगों के मन में अत्याचार का रूझान उत्पन्न होने लगे और निर्बल लोग उनके मुक़ाबिले में न्याय प्राप्ति की ओर से निराश हो जाएं। 

यह वही अली (अ.स० थे जिनकी पत्नी हजरत मुहम्मद (स.अव) की बेटी थी और बेटे इमाम हसन और हुसैन (अ.स) थे |यह वही अली थे जिनकी इस्लाम के लिए दी गयी कुर्बानियों के कारण यजीद जैसे ज़ालिम ने उनके बेटे इमाम हुसैन (अ.स) को शहीद कर दिया | हजरत अली (अ.स) के कथन आज भी लोगों को सीख देते हैं और गुमराही से बचाते हैं | 

  • हजरत अली (अ.स) का कथन है कि वतन से मोहब्बत ईमान की निशानी है : हज़रत अली(अ.स.) और सभी इंसान या तो तुम्हारे धर्म भाई हैं या फिर इंसानियत के रिश्ते से भाई हैं |
  • हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि अपने मित्रों से प्रेम करो क्योंकि अगर तुम उनके साथ प्रेम नही करोगे तो वह एक दिन तुम्हारे शत्रु बन सकते हैं। तथा अपने शत्रुओं से भी प्रेम करो क्योकि वह इस प्रकार एक दिन आपके मित्र बन सकते है।
  • हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने अलैहिस्सलाम ने कहा कि हर व्यक्ति का मूल्य उसके द्वारा किये गये पुण्यों के बराबर है।
  • हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि इबादत से कोई लाभ नही है अगर इबादत तफ़क़्क़ो (धर्म निर्देशों को समझने का ज्ञान) के साथ न की जाये। ज्ञान से कोई लाभ नही अगर उसके साथ चिंतन न हो। कुऑन पढ़ने से कोई लाभ नही अगर अल्लाह के आदेशों को समझने का प्रयत्न न किया जाये।
  • हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि मैं आप लोगों के विषय मे दो बातों से डरता हूँ
1- इच्छाओं की अधिकता जिसके कारण व्यक्ति परलोक को भूल जाता है। 
2- इद्रियों का अनुसरण जो व्यक्ति को वास्तविक्ता से दूर कर देता है। 
  • हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि मर जाओ परन्तु अपमानित न हो, डरो नहीं बेझिजक रहो क्योंकि यह जीवन दो दिन का है। एक दिन तेरे लिए लाभ का है तथा एक दिन हानि का लाभ से प्रसन्न व हानि से दुखित न हो क्योकि इन्ही दोनो के द्वारा तुझे परखा जायेगा।
  • हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि अमानत (धरोहर) रखी हुई वस्तुओं को वापस लौटाओ। चाहे वह पैगम्बरों की सन्तान के हत्यारों की ही क्यों न हों। हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि अल्लाह छः समुदायों को उनके छः अवगुणो के कारण दण्डित करेगा। 
    1-अरबों को तास्सुब( अनुचित पक्ष पात ) के कारण 
    2-ग्रामों के मुख्याओं को उनके अहंकार के कारण 
    3- शसकों को उनके अत्याचार के कारण 
    4- धर्म विद्वानों को उनके हसद (ईर्ष्या) के कारण 
    5- व्यापारियों को उनके विश्वासघात के कारण 
    6- ग्रामवासियों को उनकी अज्ञानता के कारण 
  • हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि जब यह दुनिया किसी को चाहती है तो दूसरों की अच्छाईयां भी उससे सम्बन्धित कर देती है। तथा जब किसी से शत्रुता करती है तो उसकी अच्छाईयां भी उससे छीन लेती हैं।
  • हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि याद रखो कि पापों का आनंद शीघ्र समाप्त हो जाता है। तथा पापों का अप्रियः अन्त सदैव बाक़ी रहता है
1- स्वर्ग की सम्पत्ति
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि अपने पुण्यों को छुपाना विपत्तियो पर सब्र (संतोष) करना व विपत्तियों का गिला न करना यह स्वर्ग की सम्पत्ति है।
2- पारसा (विरक्त) व्यक्ति की विशेषताऐं
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि पारसा व्यक्ति वह है जो हलाल कार्यों मे उलझ कर अल्लाह के धन्यवाद को न भूले तथा हराम कार्यो के सम्मुख अपने धैर्य को बनाए रखे।
3- प्रेम
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि अपने मित्रों से प्रेम करो क्योंकि अगर तुम उनके साथ प्रेम नही करोगे तो वह एक दिन तुम्हारे शत्रु बन सकते हैं। तथा अपने शत्रुओं से भी प्रेम करो क्योकि वह इस प्रकार एक दिन आपके मित्र बन सकते है।
4- व्यक्ति का मूल्य
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने अलैहिस्सलाम ने कहा कि हर व्यक्ति का मूल्य उसके द्वारा किये गये पुण्यों के बराबर है।
5- इबादत ज्ञान व कुऑन
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि इबादत से कोई लाभ नही है अगर इबादत तफ़क़्क़ो (धर्म निर्देशों को समझने का ज्ञान) के साथ न की जाये। ज्ञान से कोई लाभ नही अगर उसके साथ चिंतन न हो। कुऑन पढ़ने से कोई लाभ नही अगर अल्लाह के आदेशों को समझने का प्रयत्न न किया जाये।
6- इच्छाओं की अधिकता
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि मैं आप लोगों के विषय मे दो बातों से डरता हूँ
1- इच्छाओं की अधिकता जिसके कारण व्यक्ति परलोक को भूल जाता है।
2- इद्रियों का अनुसरण जो व्यक्ति को वास्तविक्ता से दूर कर देता है।
7- मित्रता
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि अपने मित्र के शत्रु से मित्रता न करो क्योंकि इससे आपका मित्र आपका शत्रु हो जायेगा।
8- सब्र के प्रकार
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि सब्र तीन प्रकार का है।
1-विपत्ति पर सब्र करना।
2-अज्ञा पालन पर सब्र करना।
3-पाप न करने पर सब्र करना।
9- दरिद्रता
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने ने कहा कि जो व्यक्ति दरिद्रता मे लिप्त हो जाये और यह न समझे कि यह अल्लाह की ओर से उस के लिए एक अनुकम्पा है तो उसने एक इच्छा को समाप्त कर दिया। और जो धनी होने पर यह न समझे कि यह धन अल्लाह की ओर से ग़ाफ़िल (अचेतन) करने के लिए है तो वह भयंकर स्थान पर संतुष्ट हो गया।
10- प्रसन्नता व दुखः
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि मर जाओ परन्तु अपमानित न हो, डरो नहीं बेझिजक रहो क्योंकि यह जीवन दो दिन का है। एक दिन तेरे लिए लाभ का है तथा एक दिन हानि का लाभ से प्रसन्न व हानि से दुखित न हो क्योकि इन्ही दोनो के द्वारा तुझे परखा जायेगा।
11- मशवरा (परामर्श)
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने ने कहा कि जो व्यक्ति भलाई चाहता है वह कभी परेशान नही होता । तथा जो अपने कार्यों मे मशवरा करता है वह कभी लज्जित नही होता।
12- देश प्रेम
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि शहरों की आबादी देश प्रेम पर निर्भर है।
13- ज्ञान
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि ज्ञान के तीन क्षेत्र हैं
1- धार्मिक आदेशों का ज्ञान
2- शरीर के लिए चिकित्सा ज्ञान
3- बोलने के लिए व्याकरण का ज्ञान
14- विद्वत्ता पूर्ण कथन
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि विद्वत्ता पूर्ण बात करने से मान बढ़ता है।
15- दरिद्रता व दीर्घायु
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि अपने आपको दरिद्रता व दीर्घायु का उपदेश न दो।
16- मोमिन
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि मोमिन (आस्तिक) को अपशब्द कहना इस्लामी आदाशों की अवहेलना है। मोमिन से जंग करना कुफ़्र है। व उसके माल की रक्षा उसके जीवन की रक्षा के समान है।
17- पढ़ना व चुप रहना
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि पढ़ो ताकि ज्ञानी बनो। चुप रहो ताकि हर प्रकार की हानि से बचो।

18- दो भयानक बातें
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि दरिद्रता के भय व अभिमान ने मनुष्य को हलाक (मार डालना) कर दिया है।।
19- अत्याचारी
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि अत्याचार करने वाला, अत्याचार मे साहयता करने वाला तथा अत्याचार से प्रसन्न होने वाला तीनों अत्याचारी हैं।
20- सरहानीय सब्र (धैर्य)
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि विपत्तियों पर सब्र करना सराहनीय हैं परन्तु अल्लाह द्वारा हराम (निषिद्ध) की गयी वस्तुओं से दूर रहने पर सब्र करना यह अति सराहनीय है।
21- धरोहर वस्तुओं का लौटाना
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि अमानत (धरोहर) रखी हुई वस्तुओं को वापस लौटाओ। चाहे वह पैगम्बरों की सन्तान के हत्यारों की ही क्यों न हों।
22- प्रसिद्धि
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि अपने आपको प्रसिद्ध न करो ताकि आराम से रहो । अपने कार्यों को छुपाओ ताकि पहचाने न जाओ। अल्लाह ने तुझे दीन समझा दिया है अतः तेरे लिए कोई कठिनाई नही है न तू लोगों को पहचान न लोग तुझे पहचाने।
23- छः समुदायों का दण्ड
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि अल्लाह छः समुदायों को उनके छः अवगुणो के कारण दण्डित करेगा।
1-अरबों को तास्सुब( अनुचित पक्ष पात ) के कारण
2-ग्रामों के मुख्याओं को उनके अहंकार के कारण
3- शसकों को उनके अत्याचार के कारण
4- धर्म विद्वानों को उनके हसद (ईर्ष्या) के कारण
5- व्यापारियों को उनके विश्वासघात के कारण
6- ग्रामवासियों को उनकी अज्ञानता के कारण
24- इमान के अंग
इमान अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि इमान के चार अंग हैं।
1- अल्लाह पर भरोसा।
2- अपने कार्यों को अल्लाह पर छोड़ना।
3- अल्लाह के आदेशों के सम्मुख झुकना।
4- अल्लाह के फ़ैसलों पर राज़ी रहना।
25- सद्व्यवहारिक उपदेश
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि अपने व्यवहार को अच्छाईयों से सुसज्जित करो ।तथा गंभीरता व सहिष्णुता को धारण करो।
26- बुरे कार्यों से दूरी
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि दूसरे लोगों के कार्यों मे अधिक सख्त न बनो। तथा बुरे कार्यों से दूर रह कर अपने व्यक्तित्व को उच्चता प्रदान करो।
27- मनुष्य की रक्षा
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि कोई व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसकी सुरक्षा का प्रबन्ध अल्लाह की और से न होता हो । वह सुरक्षा करने वाले कुए में गिरने दीवार के नीचे दबने व नरभक्षी पशुओं से उसकी रक्षा करते हैं । परन्तु जब उसकी मृत्यु का समय आजाता है तो वह अपनी सुरक्षा को उससे हटा लेते है।
28-भविषय
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि मानव पर एक ऐसा समय आयेगा कि उस समय कोई प्रतिष्ठा न पायेगा मगर एक ऐसा आदमी जिसकी कोई अहमियत न होगी।उस समय अल्लाह के आदेशों की अवहेलना करने वाले को सद् व्यवहारी व बुद्धिमान तथा विश्वासघाती को धरोहर समाझा जायेगा। उस समय सार्वजनिक समप्ति को व्यक्तिगत सम्पत्ति व सदक़ा देने को हानि समझा जायेगा।इबादत को लोगों पर अत्याचार ज़रिया बनाया जायेगा। ऐसे समय में स्त्रीयां शासक होंगी दासियों से परामर्श किया जायेगा तथा बच्चे गवर्नर होंगें।
29- झगड़े के समय होशयारी
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि झगड़े के समय ऊँटनी के दो साल के बच्चे के समान बन जाओ क्योंकि न उससे सवारी का काम लिया जासकता है और न ही उसका दूध दुहा जासकता है।अर्थात झगड़े से इस प्रकार दूर रहो कि कोई आपको उसमे लिप्त न कर सके।
30- दुनिया
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि जब यह दुनिया किसी को चाहती है तो दूसरों की अच्छाईयां भी उससे सम्बन्धित कर देती है। तथा जब किसी से शत्रुता करती है तो उसकी अच्छाईयां भी उससे छीन लेती हैं।
31- अशक्त व्यक्ति
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि कमज़ोर व्यक्ति वह है जो किसी को अपना मित्र न बना सके। तथा उससे अधिक कमज़ोर वह व्यक्ति है जो किसी को मित्र बनाने के बाद उससे मित्रता को बाक़ी न रख सके।
32- -पापों का परायश्चित
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि गुनाहाने कबीरा (बड़े पापों) का परायश्चित यह है कि दुखियों के दुखः को दूर किया जाये तथा सहायता चाहने वालों की सहायता की जाये।
33- बुद्धि मत्ता का लक्ष्ण
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि जब मनुष्य की अक़्ल कामिल(बुद्धि परिपक्व )हो जाती है तो वह कम बोलने लगता है।
34- अल्लाह से सम्पर्क
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि जो व्यक्ति अल्लाह से अपना सम्पर्क बनाता है तो अल्लाह दूसरे व्यक्तियों से भी उसका सम्बन्ध स्थापित करा देता है। जो परलोक के लिए कार्य करता है अल्लाह उसके सांसारिक कार्यों को स्वंय आसान कर देता है। तथा जो अपनी आत्मा को स्वंय उपदेश देता है अल्लाह उसकी रक्षा करता है।
35- कमी व वृद्धि
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि दो व्यक्ति मेरे कारण मारे जायेंगे (1) वह व्यक्ति जो प्रेम के कारण मुझे अत्य अधिक बढ़ायेगा (2)वह व्यक्ति जो शत्रुता के कारण मुझे बहुत कम आंकेगा।
36- किसी के कथन को कहना
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि आप जब भी कोई कथन सुनो तो पहले उसको बुद्धि के द्वारा समझो तथा परखो बाद में किसी दूसरे से कहो। क्योंकि ज्ञान को नक़्ल करने वाले बहुत हैं परन्तु उसके नियमों का पालन करने वाले बहुत कम है।
37- पापों से दूरी का फल
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि जो व्यक्ति पाप करने की शक्ति के होते हुए भी पाप न करे वह फ़रिश्तों के समान है। तथा धर्म युद्ध में शहीद होने वाले व्यक्ति को भी उससे अधिक बदला नहीं दिया जायेगा।
38- पापों का अप्रियः अन्त
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि याद रखो कि पापों का आनंद शीघ्र समाप्त हो जाता है। तथा पापों का अप्रियः अन्त सदैव बाक़ी रहता है।
39- दुनिया की विशेषता
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि सांसारिक मोह माया की विशेषता यह है कि यह धोखा देती है, हानि पहुँचाती है व चली जाती है।
40- अन्तिम चरण के अनुयायी
हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि मानवता पर एक ऐसा समय आयेगा कि जब इस्लाम केवल नाम मात्र के लिए होगा।कुऑन केवल एक रस्म बनकर रह जायेगा। उस समय मस्जिदें नई व सुसज्जित परन्तु मार्ग दर्शन से खाली होंगी। तथा इन मस्जिदों को बनाने वाले धरती के सबसे बुरे प्राणी होंगे वह फ़िसाद फैलायेंगे। जो फ़िसाद से दूर भागना चाहेगा वह उसको फ़िसाद की ओर पलटायेंगें।अल्लाह तआला अपनी सौगन्ध खाकर कहता है कि मैं ऐसे व्यक्तियों को इस प्रकार फसाऊँगा कि सूझ बूझ रखने वाले भी परेशान हो जायेंगे। हम अल्लाह से चाहते हैं कि हमारी असतर्कता को अनदेखा करे

Friday, 10 June 2016

Roza Kya Aur Kyo


          जानिए – रोज़ा क्या और क्यों ?
» इंसान के बुनियादी सवाल !!! – इस सम्पूर्ण विश्व और इंसान का अल्लाह (ईश्वर) एक है। ईश्वर ने इंसान को बनाया और उसकी सभी आवश्यकताओं को पूरा करने का प्रबंध किया। इंसान को इस ग्रह पर जीवित रहने के लिए लाइफ स hiपोर्ट सिस्टम दिया।

इंसान को उसके मूल प्रश्नों का उत्तर भी बताया।
– इंसान को क्या कोई बनाने वाला है? अगर है, तो वह क्या चाहता है?
– इंसान को पैदा क्यों किया गया?
– इंसान के जीवन का उद्देश्य क्या है? अगर है, तो उस उद्देश्य को पाने का तरीक़ा क्या है?
– इंसान को आज़ाद पैदा किया गया या मजबूर?
– अच्छी ज़िन्दगी कैसे गुज़ारी जा सकती है?
– मरने के बाद क्या होगा? इत्यादि। यह इंसान के बुनियादी सवाल हैं, जिनका जानना उसके लिए बहुत ज़रुरी है। इंसानों में से ईश्वर ने कुछ इंसानों को चुना, जो पैग़म्बर (ईशदूत) कहलाए। उन्हें अपना सन्देश भेजा, जो सभी इंसानों के लिए मार्गदर्शन है। पहले इंसान व पैग़म्बर हज़रत आदम (अलैहि॰) से लेकर आख़िरी पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सलल्लाहो अलैहि वसल्लम) तक अनेक ईशदूत आए, जो कि हर क़ौम में भेजे गए। सभी ईशदूतों ने लोगों को उन्हीं की भाषा में ईश्वर का सन्देश दिया।

» प्रश्न यह है कि बार-बार अनेक पैग़म्बर क्यों भेजे गए?
वास्तव में प्राचीनकाल में परिवहन एवं संचार के साधनों की कमी के कारण, एक जगह की ख़बर दूसरी जगह पहुँचना मुश्किल थी।
दूसरे यह कि लोग ईश्वर के सन्देश को बदल देते थे, तब ज़रुरत होती थी कि दोबारा ईश्वर का सन्देश आए।
सभी पैग़म्बरों ने एक ही सन्देश दिया कि ईश्वर एक है, दुनिया इम्तिहान की जगह है और मरने के बाद जिन्दगी है।  आख़िरी पैग़म्बर पर ईश्वर का जो अन्तिम सन्देश (क़ुरआन) उतरा, उसकी हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी स्वयं ईश्वर ने ली है। चौदह सौ साल से अधिक हो चुके हैं, मगर आज तक उसे बदला नहीं जा सका। ईश्वर का सन्देश अपनी असल शक्ल (मूलरूप) में मौजूद है, इसलिए अब ज़रूरत नहीं है कि कोई नया ईशदूत आए।

» क़ुरआन का केन्द्रीय विषय इंसान है। क़ुरआन इंसान के बारे में ईश्वर की स्कीम को बताता है।
क़ुरआन बताता है कि इंसान को सदैव के लिए पैदा किया गया है और उसे शाश्वत जीवन दिया गया है। ईश्वर ने इंसान के जीवन को दो भागों में बाँटा है :
१. मौत से पहले का समय, जो अस्थाई है, इंसान के इम्तिहान के लिए है।
२. मौत के बाद का समय, जो स्वर्ग या नरक के रूप में दुनिया में किए गए अच्छे या बुरे कर्मों का बदला मिलने के लिए है। यह कभी न ख़त्म होने वाला स्थाई दौर है। इन दोनों के बीच में मौत एक तबादले (Transition) के रूप में है।

» इंसान की ज़िन्दगी का उद्देश्य –
क़ुरआन बताता है कि दुनिया इंसान के लिए एक परीक्षास्थल है। इंसान की ज़िन्दगी का उद्देश्य ईश्वर की इबादत (उपासना) है। (क़ुरआन, 51:56) इबादत का अर्थ ईश्वर केन्द्रित जीवन (God-centred life) व्यतीत करना है। इबादत एक पार्ट-टाइम नहीं, बल्कि फुल टाइम अमल है, जो पैदाइश से लेकर मौत तक जारी रहता है।
वास्तव में इंसान की पूरी ज़िन्दगी इबादत है, अगर वह ईश्वर की मर्ज़ी के अनुसार व्यतीत हो। ईश्वर की मर्ज़ी के अनुसार जीवन व्यतीत करने का आदी बनाने के लिए, आवश्यक था कि कुछ प्रशिक्षण भी हो, इसलिए नमाज़, रोज़ा (निराहार उपवास), ज़कात और हज को इसी प्रशिक्षण के रूप में रखा गया। इनमें समय की, एनर्जी की और दौलत की क़ुरबानी द्वारा इंसान को आध्यात्मिक उत्थान के लिए और उसे व्यावहारिक जीवन के लिए लाभदायक बनाने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। इस ट्रेनिंग को बार-बार रखा गया, ताकि इंसान को अच्छाई पर स्थिर रखा जा सके, क्योंकि इंसान अन्दर व बाहर से बदलने वाला अस्तित्व रखता है।
ईश्वर सबसे बेहतर जानता है कि कौन-सी चीज़ इंसान के लिए लाभदायक है और कौन-सी हानिकारक। ईश्वर इंसान का भला चाहता है इसलिए उसने हर वह काम
जिसके करने से इंसान स्वयं को हानि पहुँचाता, करना हराम (अवैध) ठहराया और हर उस काम को जिसके न करने से इंसान स्वयं को हानि पहुँचाता, इबादत कहा और उनका करना इंसान के लिए अनिवार्य कर दिया।
ईश्वर का अन्तिम सन्देश क़ुरआन, दुनिया में पहली बार रमज़ान के महीने में अवतरित होना शुरू हुआ। इसीलिए रमज़ान का महीना क़ुरआन का महीना कहलाया। इसे क़ुरआन के मानने वालों के लिए शुक्रगुज़ारी का महीना बना दिया गया और इस पूरे महीने रोज़े रखने अनिवार्य किए गए।

» रोज़ा एक इबादत है। रोज़े को अरबी भाषा में ‘‘सौम’’ कहते हैं। इसका अर्थ ‘‘रुकने और चुप रहने’’ के हैं। क़ुरआन में इसे ‘‘सब्र’’ भी कहा गया है, जिसका अर्थ है ‘स्वयं पर नियंत्रण’ और स्थिरता व जमाव (Stability)।
इस्लाम में रोज़े का मतलब होता है केवल ईश्वर के लिए, भोर से लेकर सूरज डूबने तक खाने-पीने, सभी बुराइयों (और पति-पत्नी का सहवास करने) से स्वयं को रोके रखना। अनिवार्य रोज़े, जो केवल रमज़ान के महीने में रखे जाते हैं और यह हर व्यस्क मुसलमान के लिए अनिवार्य हैं।
क़ुरआन में कहा गया है—
♥ अल-कुरान : ‘‘ऐ ईमान लाने वालो! तुम पर रोज़े अनिवार्य किए गए, जिस प्रकार तुम से पहले के लोगों पर किए गए थे, शायद कि तुम डर रखने वाले और परहेज़गार बन जाओ।’’ – (क़ुरआन, 2:183)

♥ अल-कुरान : रमज़ान का महीना जिसमें क़ुरआन उतारा गया लोगों के मार्गदर्शन के लिए, और मार्गदर्शन और सत्य-असत्य के अन्तर के प्रमाणों के साथ। अतः तुममें जो कोई इस महीने में मौजूद हो, उसे चाहिए कि उसके रोज़े रखे और जो बीमार हो या यात्रा में हो तो दूसरे दिनों से गिनती पूरी कर ले। ईश्वर तुम्हारे साथ आसानी चाहता है, वह तुम्हारे साथ सख़्ती और कठिनाई नहीं चाहता और चाहता है कि तुम संख्या पूरी कर लो और जो सीधा मार्ग तुम्हें दिखाया गया है, उस पर ईश्वर की बड़ाई प्रकट करो और ताकि तुम कृतज्ञ बनो।’’ – (क़ुरआन, 2:185)

रोज़ा एक बहुत महत्वपूर्ण इबादत है। हर क़ौम में, हर पैग़म्बर ने रोज़ा रखने की बात कही।। क़ुरआन के अनुसार रोज़े का उद्देश्य इंसान में तक़वा या संयम (God Consciousness) पैदा करना है। तक़वा का एक अर्थ है — ‘ईश्वर का डर’ और दूसरा अर्थ है — ‘ज़िन्दगी में हमेशा एहतियात वाला तरीक़ा अपनाना।’

• ईश्वर का डर एक ऐसी बात है जो इंसान को असावधान होने अर्थात् असफल होने से बचा लेता है।
कु़रआन की आयत (Verse) ‘ताकि तुम डर रखने वाले और परहेज़गार बन जाओ’ (2:183), से पता चलता है कि रोज़ा, इंसान में ईश्वर का डर पैदा करता है और उसे परहेज़गार (संयमी) बनाता है। ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सलल्लाहो अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया—
» मेह्फुम-ए-हदीस : ‘‘जिस व्यक्ति ने (रोज़े की हालत में) झूठ बोलना और उस पर अमल करना न छोड़ा, तो ईश्वर को इसकी कुछ आवश्यकता नहीं कि वह (रोज़ा रखकर) अपना खाना- पीना छोड़ दे।’’ – (हदीस : बुख़ारी)

» मेह्फुम-ए-हदीस : ‘‘कितने ही रोज़ा रखने वाले ऐसे हैं, जिन्हें अपने रोज़े से भूख-प्यास के अतिरिक्त कुछ हासिल नहीं होता।’’ – (हदीस : दारमी) – Ummat-e-Nabi

» रोज़ा रखना इंसान की हर चीज़ को पाबन्द (नियमबद्ध) बनाता है।
• आँख का रोज़ा यह है कि जिस चीज़ को देखने से ईश्वर ने मना किया, उसे न देखें।
• कान का रोज़ा यह है कि जिस बात को सुनने से ईश्वर ने मना किया, उसे न सुनें।
• ज़ुबान का रोज़ा यह है कि जिस बात को बोलने से ईश्वर ने मना किया, उसे न बोलें।
• हाथ का रोज़ा यह है कि जिस काम को करने से ईश्वर ने मना किया, उसे न करें।
• पैर का रोज़ा यह है कि जिस तरफ़ जाने से ईश्वर ने मना किया, उधर न जाएं।
• दिमाग़ का रोज़ा यह है कि जिस बात को सोचने से ईश्वर ने मना किया, उसे न सोचें।
• इसी के साथ-साथ यह भी है कि जिन कामों को ईश्वर ने पसन्द किया, उन्हें किया जाए।
• केवल ईश्वर के बताए गए तरीक़े के अनुसार रोज़ा रखना ही इंसान को लाभ पहुँचाता है।
• ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सलल्लाहो अलैहि वसल्लम) कहते हैं—
» मेह्फुम-ए-हदीस : ‘‘इंसान के हर अमल का सवाब (अच्छा बदला) दस गुना से सात सौ गुना तक बढ़ाया जाता है, मगर ईश्वर फ़रमाता है — रोज़ा इससे अलग है, क्योंकि वह मेरे लिए है और मैं ही इसका जितना चाहूँगा बदला दूँगा।’’ – (हदीस : बुख़ारी व मुस्लिम)

» रोज़े का इंसान के दिमाग़ और उसके शरीर दोनों पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है।
• रोज़ा एक वार्षिक ट्रेनिंग कोर्स है। जिसका उद्देश्य इंसान की ऐसी विशेष ट्रेनिंग करना है, जिसके बाद वह साल भर ‘स्वयं केन्द्रित जीवन’ के बजाए, ‘ईश्वर-केन्द्रित जीवन’ व्यतीत कर सके।
• रोज़ा इंसान में अनुशासन (Self Discipline) पैदा करता है, ताकि इंसान अपनी सोचों व कामों को सही दिशा दे सके।
• रोज़ा इंसान का स्वयं पर कन्ट्रोल ठीक करता है। इंसान के अन्दर ग़ुस्सा, ख़्वाहिश (इच्छा), लालच, भूख, सेक्स और दूसरी भावनाएं हैं। इनके साथ इंसान का दो में से एक ही रिश्ता हो सकता है: इंसान इन्हें कन्ट्रोल करे, या ये इंसान को कन्ट्रोल करें। पहली सूरत में लाभ और दूसरी में हानि है। रोज़ा इंसान को इन्हें क़ाबू करना सिखाता है। अर्थात् इंसान को जुर्म और पाप से बचा लेता है।
• रोज़ा रखने के बाद इंसान का आत्मविश्वास और आत्मसंयम व संकल्प शक्ति (Will Power) बढ़ जाती है।
• इंसान जान लेता है कि जब वह खाना-पानी जैसी चीज़ों को दिन भर छोड़ सकता है, जिनके बिना जीवन संभव नहीं, तो वह बुरी बातों व आदतों को तो बड़ी आसानी से छोड़ सकता है। जो व्यक्ति भूख बर्दाश्त कर सकता है, वह दूसरी बातें भी बर्दाश्त (सहन) कर सकता है।
• रोज़ा इंसान में सहनशीलता के स्तर (level of Tolerance) को बढ़ाता है।
• रोज़ा इंसान से स्वार्थपरता (Selfishness) और सुस्ती को दूर करता है।
• रोज़ा ईश्वर की नेमतों (खाना-पानी इत्यादि) के महत्व का एहसास दिलाता है।
• रोज़ा इंसान को ईश्वर का सच्चा शुक्रगुज़ार बन्दा बनता है।
• रोज़े के द्वारा इंसान को भूख-प्यास की तकलीफ़ का अनुभव कराया जाता है, ताकि वह भूखों की भूख और प्यासों की प्यास में उनका हमदर्द बन सके।
• रोज़ा इंसान में त्याग के स्तर (Level of Sacrifice) को बढ़ाता है।
• इस तरह हम समझ सकते हैं कि रोज़ा ईश्वर का मार्गदर्शन मिलने पर उसकी बड़ाई प्रकट करने, उसका शुक्र अदा करने और परहेज़गार बनने के अतिरिक्त, न केवल इंसान के दिमाग़ बल्कि उसके शरीर पर भी बहुत अच्छा प्रभाव डालता है।

ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सलल्लाहो अलैहि वसल्लम) के शब्दों में हम कह सकते हैं —
» मेह्फुम-ए-हदीस : ‘‘हर चीज़ पर उसको पाक, पवित्र करने के लिए ज़कात है और (मानसिक व शारीरिक बीमारियों से पाक करने के लिए) शरीर की ज़कात (दान) रोज़ा है।’’ – (हदीस : इब्ने माजा)

» Urdu Words :
हज़रत : आदरणीय व्यक्तित्व के लिए उपाधि सूचक शब्द।
सलल्लाहो अलैहि वसल्लम : हज़रत मुहम्मद (सलल्लाहो अलैहि वसल्लम) पर अल्लाह की रहमत व सलामती हो।
हदीस : अल्लाह के अन्तिम सन्देष्टा हज़रत मुहम्मद (सलल्लाहो अलैहि वसल्लम) के वचनों, कर्मों और तरीकों (ढंगों) को हदीस कहते हैं।
«
» इंसान के बुनियादी सवाल !!! – इस सम्पूर्ण विश्व और इंसान का अल्लाह (ईश्वर) एक है। ईश्वर ने इंसान को बनाया और उसकी सभी आवश्यकताओं को पूरा करने का प्रबंध किया। इंसान को इस ग्रह पर जीवित रहने के लिए लाइफ सपोर्ट सिस्टम दिया।
इंसान को उसके मूल प्रश्नों का उत्तर भी बताया।
– इंसान को क्या कोई बनाने वाला है? अगर है, तो वह क्या चाहता है?
– इंसान को पैदा क्यों किया गया?
– इंसान के जीवन का उद्देश्य क्या है? अगर है, तो उस उद्देश्य को पाने का तरीक़ा क्या है?
– इंसान को आज़ाद पैदा किया गया या मजबूर?
– अच्छी ज़िन्दगी कैसे गुज़ारी जा सकती है?
– मरने के बाद क्या होगा? इत्यादि। यह इंसान के बुनियादी सवाल हैं, जिनका जानना उसके लिए बहुत ज़रुरी है। इंसानों में से ईश्वर ने कुछ इंसानों को चुना, जो पैग़म्बर (ईशदूत) कहलाए। उन्हें अपना सन्देश भेजा, जो सभी इंसानों के लिए मार्गदर्शन है। पहले इंसान व पैग़म्बर हज़रत आदम (अलैहि॰) से लेकर आख़िरी पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सलल्लाहो अलैहि वसल्लम) तक अनेक ईशदूत आए, जो कि हर क़ौम में भेजे गए। सभी ईशदूतों ने लोगों को उन्हीं की भाषा में ईश्वर का सन्देश दिया।
» प्रश्न यह है कि बार-बार अनेक पैग़म्बर क्यों भेजे गए? 
वास्तव में प्राचीनकाल में परिवहन एवं संचार के साधनों की कमी के कारण, एक जगह की ख़बर दूसरी जगह पहुँचना मुश्किल थी।
दूसरे यह कि लोग ईश्वर के सन्देश को बदल देते थे, तब ज़रुरत होती थी कि दोबारा ईश्वर का सन्देश आए।
सभी पैग़म्बरों ने एक ही सन्देश दिया कि ईश्वर एक है, दुनिया इम्तिहान की जगह है और मरने के बाद जिन्दगी है। पहले के सभी पैग़म्बरों का मिशन लोकल था, मगर आख़िरी पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सलल्लाहो अलैहि वसल्लम) का मिशन यूनीवर्सल है। आख़िरी पैग़म्बर पर ईश्वर का जो अन्तिम सन्देश (क़ुरआन) उतरा, उसकी हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी स्वयं ईश्वर ने ली है। चौदह सौ साल से अधिक हो चुके हैं, मगर आज तक उसे बदला नहीं जा सका। ईश्वर का सन्देश अपनी असल शक्ल (मूलरूप) में मौजूद है, इसलिए अब ज़रूरत नहीं है कि कोई नया ईशदूत आए।
» क़ुरआन का केन्द्रीय विषय इंसान है। क़ुरआन इंसान के बारे में ईश्वर की स्कीम को बताता है।
क़ुरआन बताता है कि इंसान को सदैव के लिए पैदा किया गया है और उसे शाश्वत जीवन दिया गया है। ईश्वर ने इंसान के जीवन को दो भागों में बाँटा है :
१. मौत से पहले का समय, जो अस्थाई है, इंसान के इम्तिहान के लिए है।
२. मौत के बाद का समय, जो स्वर्ग या नरक के रूप में दुनिया में किए गए अच्छे या बुरे कर्मों का बदला मिलने के लिए है। यह कभी न ख़त्म होने वाला स्थाई दौर है। इन दोनों के बीच में मौत एक तबादले (Transition) के रूप में है।
» इंसान की ज़िन्दगी का उद्देश्य –
क़ुरआन बताता है कि दुनिया इंसान के लिए एक परीक्षास्थल है। इंसान की ज़िन्दगी का उद्देश्य ईश्वर की इबादत (उपासना) है। (क़ुरआन, 51:56) इबादत का अर्थ ईश्वर केन्द्रित जीवन (God-centred life) व्यतीत करना है। इबादत एक पार्ट-टाइम नहीं, बल्कि फुल टाइम अमल है, जो पैदाइश से लेकर मौत तक जारी रहता है।
वास्तव में इंसान की पूरी ज़िन्दगी इबादत है, अगर वह ईश्वर की मर्ज़ी के अनुसार व्यतीत हो। ईश्वर की मर्ज़ी के अनुसार जीवन व्यतीत करने का आदी बनाने के लिए, आवश्यक था कि कुछ प्रशिक्षण भी हो, इसलिए नमाज़, रोज़ा (निराहार उपवास), ज़कात और हज को इसी प्रशिक्षण के रूप में रखा गया। इनमें समय की, एनर्जी की और दौलत की क़ुरबानी द्वारा इंसान को आध्यात्मिक उत्थान के लिए और उसे व्यावहारिक जीवन के लिए लाभदायक बनाने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। इस ट्रेनिंग को बार-बार रखा गया, ताकि इंसान को अच्छाई पर स्थिर रखा जा सके, क्योंकि इंसान अन्दर व बाहर से बदलने वाला अस्तित्व रखता है।
ईश्वर सबसे बेहतर जानता है कि कौन-सी चीज़ इंसान के लिए लाभदायक है और कौन-सी हानिकारक। ईश्वर इंसान का भला चाहता है इसलिए उसने हर वह काम
जिसके करने से इंसान स्वयं को हानि पहुँचाता, करना हराम (अवैध) ठहराया और हर उस काम को जिसके न करने से इंसान स्वयं को हानि पहुँचाता, इबादत कहा और उनका करना इंसान के लिए अनिवार्य कर दिया।
ईश्वर का अन्तिम सन्देश क़ुरआन, दुनिया में पहली बार रमज़ान के महीने में अवतरित होना शुरू हुआ। इसीलिए रमज़ान का महीना क़ुरआन का महीना कहलाया। इसे क़ुरआन के मानने वालों के लिए शुक्रगुज़ारी का महीना बना दिया गया और इस पूरे महीने रोज़े रखने अनिवार्य किए गए।
» रोज़ा एक इबादत है। रोज़े को अरबी भाषा में ‘‘सौम’’ कहते हैं। इसका अर्थ ‘‘रुकने और चुप रहने’’ के हैं। क़ुरआन में इसे ‘‘सब्र’’ भी कहा गया है, जिसका अर्थ है ‘स्वयं पर नियंत्रण’ और स्थिरता व जमाव (Stability)।
इस्लाम में रोज़े का मतलब होता है केवल ईश्वर के लिए, भोर से लेकर सूरज डूबने तक खाने-पीने, सभी बुराइयों (और पति-पत्नी का सहवास करने) से स्वयं को रोके रखना। अनिवार्य रोज़े, जो केवल रमज़ान के महीने में रखे जाते हैं और यह हर व्यस्क मुसलमान के लिए अनिवार्य हैं।
क़ुरआन में कहा गया है—
♥ अल-कुरान : ‘‘ऐ ईमान लाने वालो! तुम पर रोज़े अनिवार्य किए गए, जिस प्रकार तुम से पहले के लोगों पर किए गए थे, शायद कि तुम डर रखने वाले और परहेज़गार बन जाओ।’’ –(क़ुरआन, 2:183)
♥ अल-कुरान : रमज़ान का महीना जिसमें क़ुरआन उतारा गया लोगों के मार्गदर्शन के लिए, और मार्गदर्शन और सत्य-असत्य के अन्तर के प्रमाणों के साथ। अतः तुममें जो कोई इस महीने में मौजूद हो, उसे चाहिए कि उसके रोज़े रखे और जो बीमार हो या यात्रा में हो तो दूसरे दिनों से गिनती पूरी कर ले। ईश्वर तुम्हारे साथ आसानी चाहता है, वह तुम्हारे साथ सख़्ती और कठिनाई नहीं चाहता और चाहता है कि तुम संख्या पूरी कर लो और जो सीधा मार्ग तुम्हें दिखाया गया है, उस पर ईश्वर की बड़ाई प्रकट करो और ताकि तुम कृतज्ञ बनो।’’ – (क़ुरआन, 2:185)
रोज़ा एक बहुत महत्वपूर्ण इबादत है। हर क़ौम में, हर पैग़म्बर ने रोज़ा रखने की बात कही। आज भी रोज़ा हर धर्म में किसी न किसी रूप में मौजूद है। क़ुरआन के अनुसार रोज़े का उद्देश्य इंसान में तक़वा या संयम (God Consciousness) पैदा करना है। तक़वा का एक अर्थ है — ‘ईश्वर का डर’ और दूसरा अर्थ है — ‘ज़िन्दगी में हमेशा एहतियात वाला तरीक़ा अपनाना।’
• ईश्वर का डर एक ऐसी बात है जो इंसान को असावधान होने अर्थात् असफल होने से बचा लेता है।
कु़रआन की आयत (Verse) ‘ताकि तुम डर रखने वाले और परहेज़गार बन जाओ’ (2:183), से पता चलता है कि रोज़ा, इंसान में ईश्वर का डर पैदा करता है और उसे परहेज़गार (संयमी) बनाता है। ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सलल्लाहो अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया—
» मेह्फुम-ए-हदीस : ‘‘जिस व्यक्ति ने (रोज़े की हालत में) झूठ बोलना और उस पर अमल करना न छोड़ा, तो ईश्वर को इसकी कुछ आवश्यकता नहीं कि वह (रोज़ा रखकर) अपना खाना- पीना छोड़ दे।’’ – (हदीस : बुख़ारी)
» मेह्फुम-ए-हदीस : ‘‘कितने ही रोज़ा रखने वाले ऐसे हैं, जिन्हें अपने रोज़े से भूख-प्यास के अतिरिक्त कुछ हासिल नहीं होता।’’ – (हदीस : दारमी) – @[156344474474186:]
» रोज़ा रखना इंसान की हर चीज़ को पाबन्द (नियमबद्ध) बनाता है। 
• आँख का रोज़ा यह है कि जिस चीज़ को देखने से ईश्वर ने मना किया, उसे न देखें।
• कान का रोज़ा यह है कि जिस बात को सुनने से ईश्वर ने मना किया, उसे न सुनें।
• ज़ुबान का रोज़ा यह है कि जिस बात को बोलने से ईश्वर ने मना किया, उसे न बोलें।
• हाथ का रोज़ा यह है कि जिस काम को करने से ईश्वर ने मना किया, उसे न करें।
• पैर का रोज़ा यह है कि जिस तरफ़ जाने से ईश्वर ने मना किया, उधर न जाएं।
• दिमाग़ का रोज़ा यह है कि जिस बात को सोचने से ईश्वर ने मना किया, उसे न सोचें।
• इसी के साथ-साथ यह भी है कि जिन कामों को ईश्वर ने पसन्द किया, उन्हें किया जाए।
• केवल ईश्वर के बताए गए तरीक़े के अनुसार रोज़ा रखना ही इंसान को लाभ पहुँचाता है।
• ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सलल्लाहो अलैहि वसल्लम) कहते हैं—
» मेह्फुम-ए-हदीस : ‘‘इंसान के हर अमल का सवाब (अच्छा बदला) दस गुना से सात सौ गुना तक बढ़ाया जाता है, मगर ईश्वर फ़रमाता है — रोज़ा इससे अलग है, क्योंकि वह मेरे लिए है और मैं ही इसका जितना चाहूँगा बदला दूँगा।’’ – (हदीस : बुख़ारी व मुस्लिम)
» रोज़े का इंसान के दिमाग़ और उसके शरीर दोनों पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है।
• रोज़ा एक वार्षिक ट्रेनिंग कोर्स है। जिसका उद्देश्य इंसान की ऐसी विशेष ट्रेनिंग करना है, जिसके बाद वह साल भर ‘स्वयं केन्द्रित जीवन’ के बजाए, ‘ईश्वर-केन्द्रित जीवन’ व्यतीत कर सके।
• रोज़ा इंसान में अनुशासन (Self Discipline) पैदा करता है, ताकि इंसान अपनी सोचों व कामों को सही दिशा दे सके।
• रोज़ा इंसान का स्वयं पर कन्ट्रोल ठीक करता है। इंसान के अन्दर ग़ुस्सा, ख़्वाहिश (इच्छा), लालच, भूख, सेक्स और दूसरी भावनाएं हैं। इनके साथ इंसान का दो में से एक ही रिश्ता हो सकता है: इंसान इन्हें कन्ट्रोल करे, या ये इंसान को कन्ट्रोल करें। पहली सूरत में लाभ और दूसरी में हानि है। रोज़ा इंसान को इन्हें क़ाबू करना सिखाता है। अर्थात् इंसान को जुर्म और पाप से बचा लेता है।
• रोज़ा रखने के बाद इंसान का आत्मविश्वास और आत्मसंयम व संकल्प शक्ति (Will Power) बढ़ जाती है।
• इंसान जान लेता है कि जब वह खाना-पानी जैसी चीज़ों को दिन भर छोड़ सकता है, जिनके बिना जीवन संभव नहीं, तो वह बुरी बातों व आदतों को तो बड़ी आसानी से छोड़ सकता है। जो व्यक्ति भूख बर्दाश्त कर सकता है, वह दूसरी बातें भी बर्दाश्त (सहन) कर सकता है।
• रोज़ा इंसान में सहनशीलता के स्तर (level of Tolerance) को बढ़ाता है।
• रोज़ा इंसान से स्वार्थपरता (Selfishness) और सुस्ती को दूर करता है।
• रोज़ा ईश्वर की नेमतों (खाना-पानी इत्यादि) के महत्व का एहसास दिलाता है।
• रोज़ा इंसान को ईश्वर का सच्चा शुक्रगुज़ार बन्दा बनता है।
• रोज़े के द्वारा इंसान को भूख-प्यास की तकलीफ़ का अनुभव कराया जाता है, ताकि वह भूखों की भूख और प्यासों की प्यास में उनका हमदर्द बन सके।
• रोज़ा इंसान में त्याग के स्तर (Level of Sacrifice) को बढ़ाता है।
• इस तरह हम समझ सकते हैं कि रोज़ा ईश्वर का मार्गदर्शन मिलने पर उसकी बड़ाई प्रकट करने, उसका शुक्र अदा करने और परहेज़गार बनने के अतिरिक्त, न केवल इंसान के दिमाग़ बल्कि उसके शरीर पर भी बहुत अच्छा प्रभाव डालता है।
ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सलल्लाहो अलैहि वसल्लम) के शब्दों में हम कह सकते हैं —
» इंसान के बुनियादी सवाल !!! – इस सम्पूर्ण विश्व और इंसान का अल्लाह (ईश्वर) एक है। ईश्वर ने इंसान को बनाया और उसकी सभी आवश्यकताओं को पूरा करने का प्रबंध किया। इंसान को इस ग्रह पर जीवित रहने के लिए लाइफ सपोर्ट सिस्टम दिया।
इंसान को उसके मूल प्रश्नों का उत्तर भी बताया।
– इंसान को क्या कोई बनाने वाला है? अगर है, तो वह क्या चाहता है?
– इंसान को पैदा क्यों किया गया?
– इंसान के जीवन का उद्देश्य क्या है? अगर है, तो उस उद्देश्य को पाने का तरीक़ा क्या है?
– इंसान को आज़ाद पैदा किया गया या मजबूर?
– अच्छी ज़िन्दगी कैसे गुज़ारी जा सकती है?
– मरने के बाद क्या होगा? इत्यादि। यह इंसान के बुनियादी सवाल हैं, जिनका जानना उसके लिए बहुत ज़रुरी है। इंसानों में से ईश्वर ने कुछ इंसानों को चुना, जो पैग़म्बर (ईशदूत) कहलाए। उन्हें अपना सन्देश भेजा, जो सभी इंसानों के लिए मार्गदर्शन है। पहले इंसान व पैग़म्बर हज़रत आदम (अलैहि॰) से लेकर आख़िरी पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सलल्लाहो अलैहि वसल्लम) तक अनेक ईशदूत आए, जो कि हर क़ौम में भेजे गए। सभी ईशदूतों ने लोगों को उन्हीं की भाषा में ईश्वर का सन्देश दिया।
» प्रश्न यह है कि बार-बार अनेक पैग़म्बर क्यों भेजे गए? 
वास्तव में प्राचीनकाल में परिवहन एवं संचार के साधनों की कमी के कारण, एक जगह की ख़बर दूसरी जगह पहुँचना मुश्किल थी।
दूसरे यह कि लोग ईश्वर के सन्देश को बदल देते थे, तब ज़रुरत होती थी कि दोबारा ईश्वर का सन्देश आए।
सभी पैग़म्बरों ने एक ही सन्देश दिया कि ईश्वर एक है, दुनिया इम्तिहान की जगह है और मरने के बाद जिन्दगी है। पहले के सभी पैग़म्बरों का मिशन लोकल था, मगर आख़िरी पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सलल्लाहो अलैहि वसल्लम) का मिशन यूनीवर्सल है। आख़िरी पैग़म्बर पर ईश्वर का जो अन्तिम सन्देश (क़ुरआन) उतरा, उसकी हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी स्वयं ईश्वर ने ली है। चौदह सौ साल से अधिक हो चुके हैं, मगर आज तक उसे बदला नहीं जा सका। ईश्वर का सन्देश अपनी असल शक्ल (मूलरूप) में मौजूद है, इसलिए अब ज़रूरत नहीं है कि कोई नया ईशदूत आए।
» क़ुरआन का केन्द्रीय विषय इंसान है। क़ुरआन इंसान के बारे में ईश्वर की स्कीम को बताता है।
क़ुरआन बताता है कि इंसान को सदैव के लिए पैदा किया गया है और उसे शाश्वत जीवन दिया गया है। ईश्वर ने इंसान के जीवन को दो भागों में बाँटा है :
१. मौत से पहले का समय, जो अस्थाई है, इंसान के इम्तिहान के लिए है।
२. मौत के बाद का समय, जो स्वर्ग या नरक के रूप में दुनिया में किए गए अच्छे या बुरे कर्मों का बदला मिलने के लिए है। यह कभी न ख़त्म होने वाला स्थाई दौर है। इन दोनों के बीच में मौत एक तबादले (Transition) के रूप में है।
» इंसान की ज़िन्दगी का उद्देश्य –
क़ुरआन बताता है कि दुनिया इंसान के लिए एक परीक्षास्थल है। इंसान की ज़िन्दगी का उद्देश्य ईश्वर की इबादत (उपासना) है। (क़ुरआन, 51:56) इबादत का अर्थ ईश्वर केन्द्रित जीवन (God-centred life) व्यतीत करना है। इबादत एक पार्ट-टाइम नहीं, बल्कि फुल टाइम अमल है, जो पैदाइश से लेकर मौत तक जारी रहता है।
वास्तव में इंसान की पूरी ज़िन्दगी इबादत है, अगर वह ईश्वर की मर्ज़ी के अनुसार व्यतीत हो। ईश्वर की मर्ज़ी के अनुसार जीवन व्यतीत करने का आदी बनाने के लिए, आवश्यक था कि कुछ प्रशिक्षण भी हो, इसलिए नमाज़, रोज़ा (निराहार उपवास), ज़कात और हज को इसी प्रशिक्षण के रूप में रखा गया। इनमें समय की, एनर्जी की और दौलत की क़ुरबानी द्वारा इंसान को आध्यात्मिक उत्थान के लिए और उसे व्यावहारिक जीवन के लिए लाभदायक बनाने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। इस ट्रेनिंग को बार-बार रखा गया, ताकि इंसान को अच्छाई पर स्थिर रखा जा सके, क्योंकि इंसान अन्दर व बाहर से बदलने वाला अस्तित्व रखता है।
ईश्वर सबसे बेहतर जानता है कि कौन-सी चीज़ इंसान के लिए लाभदायक है और कौन-सी हानिकारक। ईश्वर इंसान का भला चाहता है इसलिए उसने हर वह काम
जिसके करने से इंसान स्वयं को हानि पहुँचाता, करना हराम (अवैध) ठहराया और हर उस काम को जिसके न करने से इंसान स्वयं को हानि पहुँचाता, इबादत कहा और उनका करना इंसान के लिए अनिवार्य कर दिया।
ईश्वर का अन्तिम सन्देश क़ुरआन, दुनिया में पहली बार रमज़ान के महीने में अवतरित होना शुरू हुआ। इसीलिए रमज़ान का महीना क़ुरआन का महीना कहलाया। इसे क़ुरआन के मानने वालों के लिए शुक्रगुज़ारी का महीना बना दिया गया और इस पूरे महीने रोज़े रखने अनिवार्य किए गए।
» रोज़ा एक इबादत है। रोज़े को अरबी भाषा में ‘‘सौम’’ कहते हैं। इसका अर्थ ‘‘रुकने और चुप रहने’’ के हैं। क़ुरआन में इसे ‘‘सब्र’’ भी कहा गया है, जिसका अर्थ है ‘स्वयं पर नियंत्रण’ और स्थिरता व जमाव (Stability)।
इस्लाम में रोज़े का मतलब होता है केवल ईश्वर के लिए, भोर से लेकर सूरज डूबने तक खाने-पीने, सभी बुराइयों (और पति-पत्नी का सहवास करने) से स्वयं को रोके रखना। अनिवार्य रोज़े, जो केवल रमज़ान के महीने में रखे जाते हैं और यह हर व्यस्क मुसलमान के लिए अनिवार्य हैं।
क़ुरआन में कहा गया है—
♥ अल-कुरान : ‘‘ऐ ईमान लाने वालो! तुम पर रोज़े अनिवार्य किए गए, जिस प्रकार तुम से पहले के लोगों पर किए गए थे, शायद कि तुम डर रखने वाले और परहेज़गार बन जाओ।’’ –(क़ुरआन, 2:183)
♥ अल-कुरान : रमज़ान का महीना जिसमें क़ुरआन उतारा गया लोगों के मार्गदर्शन के लिए, और मार्गदर्शन और सत्य-असत्य के अन्तर के प्रमाणों के साथ। अतः तुममें जो कोई इस महीने में मौजूद हो, उसे चाहिए कि उसके रोज़े रखे और जो बीमार हो या यात्रा में हो तो दूसरे दिनों से गिनती पूरी कर ले। ईश्वर तुम्हारे साथ आसानी चाहता है, वह तुम्हारे साथ सख़्ती और कठिनाई नहीं चाहता और चाहता है कि तुम संख्या पूरी कर लो और जो सीधा मार्ग तुम्हें दिखाया गया है, उस पर ईश्वर की बड़ाई प्रकट करो और ताकि तुम कृतज्ञ बनो।’’ – (क़ुरआन, 2:185)
रोज़ा एक बहुत महत्वपूर्ण इबादत है। हर क़ौम में, हर पैग़म्बर ने रोज़ा रखने की बात कही। आज भी रोज़ा हर धर्म में किसी न किसी रूप में मौजूद है। क़ुरआन के अनुसार रोज़े का उद्देश्य इंसान में तक़वा या संयम (God Consciousness) पैदा करना है। तक़वा का एक अर्थ है — ‘ईश्वर का डर’ और दूसरा अर्थ है — ‘ज़िन्दगी में हमेशा एहतियात वाला तरीक़ा अपनाना।’
• ईश्वर का डर एक ऐसी बात है जो इंसान को असावधान होने अर्थात् असफल होने से बचा लेता है।
कु़रआन की आयत (Verse) ‘ताकि तुम डर रखने वाले और परहेज़गार बन जाओ’ (2:183), से पता चलता है कि रोज़ा, इंसान में ईश्वर का डर पैदा करता है और उसे परहेज़गार (संयमी) बनाता है। ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सलल्लाहो अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया—
» मेह्फुम-ए-हदीस : ‘‘जिस व्यक्ति ने (रोज़े की हालत में) झूठ बोलना और उस पर अमल करना न छोड़ा, तो ईश्वर को इसकी कुछ आवश्यकता नहीं कि वह (रोज़ा रखकर) अपना खाना- पीना छोड़ दे।’’ – (हदीस : बुख़ारी)
» मेह्फुम-ए-हदीस : ‘‘कितने ही रोज़ा रखने वाले ऐसे हैं, जिन्हें अपने रोज़े से भूख-प्यास के अतिरिक्त कुछ हासिल नहीं होता।’’ – (हदीस : दारमी) – @[156344474474186:]
» रोज़ा रखना इंसान की हर चीज़ को पाबन्द (नियमबद्ध) बनाता है। 
• आँख का रोज़ा यह है कि जिस चीज़ को देखने से ईश्वर ने मना किया, उसे न देखें।
• कान का रोज़ा यह है कि जिस बात को सुनने से ईश्वर ने मना किया, उसे न सुनें।
• ज़ुबान का रोज़ा यह है कि जिस बात को बोलने से ईश्वर ने मना किया, उसे न बोलें।
• हाथ का रोज़ा यह है कि जिस काम को करने से ईश्वर ने मना किया, उसे न करें।
• पैर का रोज़ा यह है कि जिस तरफ़ जाने से ईश्वर ने मना किया, उधर न जाएं।
• दिमाग़ का रोज़ा यह है कि जिस बात को सोचने से ईश्वर ने मना किया, उसे न सोचें।
• इसी के साथ-साथ यह भी है कि जिन कामों को ईश्वर ने पसन्द किया, उन्हें किया जाए।
• केवल ईश्वर के बताए गए तरीक़े के अनुसार रोज़ा रखना ही इंसान को लाभ पहुँचाता है।
• ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सलल्लाहो अलैहि वसल्लम) कहते हैं—
» मेह्फुम-ए-हदीस : ‘‘इंसान के हर अमल का सवाब (अच्छा बदला) दस गुना से सात सौ गुना तक बढ़ाया जाता है, मगर ईश्वर फ़रमाता है — रोज़ा इससे अलग है, क्योंकि वह मेरे लिए है और मैं ही इसका जितना चाहूँगा बदला दूँगा।’’ – (हदीस : बुख़ारी व मुस्लिम)
» रोज़े का इंसान के दिमाग़ और उसके शरीर दोनों पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है।
• रोज़ा एक वार्षिक ट्रेनिंग कोर्स है। जिसका उद्देश्य इंसान की ऐसी विशेष ट्रेनिंग करना है, जिसके बाद वह साल भर ‘स्वयं केन्द्रित जीवन’ के बजाए, ‘ईश्वर-केन्द्रित जीवन’ व्यतीत कर सके।
• रोज़ा इंसान में अनुशासन (Self Discipline) पैदा करता है, ताकि इंसान अपनी सोचों व कामों को सही दिशा दे सके।
• रोज़ा इंसान का स्वयं पर कन्ट्रोल ठीक करता है। इंसान के अन्दर ग़ुस्सा, ख़्वाहिश (इच्छा), लालच, भूख, सेक्स और दूसरी भावनाएं हैं। इनके साथ इंसान का दो में से एक ही रिश्ता हो सकता है: इंसान इन्हें कन्ट्रोल करे, या ये इंसान को कन्ट्रोल करें। पहली सूरत में लाभ और दूसरी में हानि है। रोज़ा इंसान को इन्हें क़ाबू करना सिखाता है। अर्थात् इंसान को जुर्म और पाप से बचा लेता है।
• रोज़ा रखने के बाद इंसान का आत्मविश्वास और आत्मसंयम व संकल्प शक्ति (Will Power) बढ़ जाती है।
• इंसान जान लेता है कि जब वह खाना-पानी जैसी चीज़ों को दिन भर छोड़ सकता है, जिनके बिना जीवन संभव नहीं, तो वह बुरी बातों व आदतों को तो बड़ी आसानी से छोड़ सकता है। जो व्यक्ति भूख बर्दाश्त कर सकता है, वह दूसरी बातें भी बर्दाश्त (सहन) कर सकता है।
• रोज़ा इंसान में सहनशीलता के स्तर (level of Tolerance) को बढ़ाता है।
• रोज़ा इंसान से स्वार्थपरता (Selfishness) और सुस्ती को दूर करता है।
• रोज़ा ईश्वर की नेमतों (खाना-पानी इत्यादि) के महत्व का एहसास दिलाता है।
• रोज़ा इंसान को ईश्वर का सच्चा शुक्रगुज़ार बन्दा बनता है।
• रोज़े के द्वारा इंसान को भूख-प्यास की तकलीफ़ का अनुभव कराया जाता है, ताकि वह भूखों की भूख और प्यासों की प्यास में उनका हमदर्द बन सके।
• रोज़ा इंसान में त्याग के स्तर (Level of Sacrifice) को बढ़ाता है।
• इस तरह हम समझ सकते हैं कि रोज़ा ईश्वर का मार्गदर्शन मिलने पर उसकी बड़ाई प्रकट करने, उसका शुक्र अदा करने और परहेज़गार बनने के अतिरिक्त, न केवल इंसान के दिमाग़ बल्कि उसके शरीर पर भी बहुत अच्छा प्रभाव डालता है।
ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सलल्लाहो अलैहि वसल्लम) के शब्दों में हम कह सकते हैं —
» मेह्फुम-ए-हदीस : ‘‘हर चीज़ पर उसको पाक, पवित्र करने के लिए ज़कात है और (मानसिक व शारीरिक बीमारियों से पाक करने के लिए) शरीर की ज़कात (दान) रोज़ा है।’’ – (हदीस : इब्ने माजा) 

Friday, 13 May 2016

हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की जीवनी



हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम Moses (PBUH)

 

मूसा (Moses) सभी इब्राहिमी धर्मों में एक प्रमुख नबी (ईश्वरीय सन्देशवाहक) हैं । ख़ास तौर पर वो यहूदी धर्म के संस्थापक माने जाते हैं । बाइबल में हज़रत मूसा की कहानी दी गयी है, जिसके मुताबिक मिस्र के फ़राओ के ज़माने में जन्मे मूसा यहूदी माता-पिता के की औलाद थे पर मौत के डर से उनको उनकी माँ ने नील नदी में बहा दिया। उनको फिर फ़राओ की पत्नी ने पाला और मूसा एक मिस्री राजकुमार बने । बाद में मूसा को मालूम हुआ कि वो यहूदी हैं और उनका यहूदी राष्ट्र (जिसको फरओ ने ग़ुलाम बना लिया था) अत्याचार सह रहा है । मूसा का एक पहाड़ पर परमेश्वर से साक्षात्कार हुआ।

जब मूसा ईश्वरीय-आदेश पाने के लिए माउंट सेनाई (सेनाई पर्वत) पर चले. इस्राएल को यह डर सताने लगा कि वे लौट कर नहीं आएंगे और उन्होंने हारून से उनके लिए इस्राएल के ईश्वर की मूर्ति बनाने के लिए कहा हालांकि, हारून ने इस्राएल के परमेश्वर का प्रतिनिधि बनने से इनकार कर दिया. इस्राएलियों ने हारून को अभिभूत करने के लिए काफी शिकायत की थी, इसलिए उसने उनका अनुपालन किया और इस्राएलियों के कानों की सोने की बालियां इकट्ठी की. उसने उसे पिघलाया और सोने की एक जवान बैल की मूर्ती बनाई गई. बैल की पूजा कई संस्कृतियों में आम बात थी. मिस्र में, निष्क्रमण के विवरण के अनुसार जब इब्रानी (यहूदी) लोगों को आये अधिक समय नहीं हुआ था तब ही, एपिस बुल एवं बैल के सिर वाला खनुम पूज्य पात्र थे, जैसा कि कुछ लोगों का मानना है, निर्वासन के समय इब्रानी पुनर्जीवन प्राप्त कर रहे थे; वैकल्पिक रूप से, कुछ लोगों का विश्वास है कि इस्राएल के ईश्वर का संबंध चित्रित बछड़े/बैल देवता के रूप में धार्मिक रूप से आत्मसात और समन्वयता करने की प्रक्रिया के माध्यम से अंगीकृत कर लिया जाना था. मिस्रवासियों एवं इब्रानियों के मध्य प्राचीन पड़ोसियों में निकटरूप पूर्व में तथा ईजियन में, ऑरोक्स, वन्य बैल, की व्यापक रूप से पूजा की जाती थी, अक्सर चन्द्र बैल एवं ईएल के प्राणी के रूप में. इसकी मिनियोन अविभार्व के कारण यूनानी मिथक में क्रेटन बैल के रूप में उत्तरजीवी रहा. भारत में अनेक हिन्दुओं के लिए यह पूज्य है. यूनानियों (मिस्रवासियों) के बीच हाथोर को गाय के रूप में प्रतिनिधित्व प्राप्त है, एवं साथ ही साथ इसे आकाश गंगा के रूप में पेश किया जाता है, और अक्सर इसकी पहचान अपने पड़ोसी की देवी ईएल आशेरा के समकक्ष ही की गई. इब्रियों जनजातियों का विकास इन लोगों और पैन्थिओन के बीच होता गया.


अतः बछड़े की मूर्ति बनाई. हारून ने बछड़े के सामने एक वेदी भी बनाई और यह घोषणा भी कर दी कि इस्राएल के लोगों, ये तुम्हारे ईश्वर हैं, जो तुमलोगों का मिस्र की जमीन से बाहर ले आया है". और दूसरे ही दिन, इस्राएलियों ने सोने के बछड़े को भेंट अर्पित की और(अश्लील) नाच किया गया, उत्सव मनाया. मूसा ने जब उन्हें यह सबकुछ करते देखा तो वे उनसे क्रोधित हो गए, उन्होंने उन शिला लेखों को जिस पर ईश्वर ने इस्राएलियों के लिए अपने कानून लिखे थे, ज़मीन पर फेंक दिया.

सोने का बछड़ा बनाने और उसकी पूजा करने से दोषमुक्ति को क़ुरान की सूरा ताहा के [90-94] आयतों में देखा जा सकता है:

"इससे पहले ही हारून ने उनसे कहा था: "ऐ मेरे लोगों [इस्राएल के बच्चे] तुम्हारा इम्तिहान इसी में है: वास्तव में तुम्हारे मालिक (अल्लाह) हैं सबसे ज्यादा दयालु (रहमदिल); इसलिए मेरे अनुगामी बनो और मेरे आदेशों का अनुपालन करो" (90) उन्होंने कहा: "हम इस पंथ का त्याग नहीं करेंगे, लेकिन हम तब तक खुद को इसके लिए समर्पित कर देंगे जब तक कि मूसा वापस नहीं आते." (91) (मूसा) ने कहा: "हे हारून! किस बात ने तुम्हें पीछे कर दिया? (92) जबकि तुमने देखा कि वे गलत राह पर जा रहे थे. क्या तुमने तब मेरे आदेश की अवज्ञा की ?" (93) (हारून) ने जाब दिया: "ऐ मेरी मां के बेटे! (मुझे) मेरी दाढ़ी से न पकड़ो और न ही, मेरे सिर के (केशों) से! सचमुच मुझे इस बात का डर था कि आप कहीं यह न कहें कि "तू ने इस्राएल के बच्चों के बीच एक विभाजन खड़ा कर दिया है, और तू मेरे वचन का सम्मान नहीं करता है." (94)"

बाद में, अल्लाह ने मूसा से कहा कि उसके लोगों ने अपने आप को पाप में लिप्त कर लिया है, एवं उन्होंने उन्हें नष्ट कर देने की योजना बनाई है इस्राएलियों पर प्लेग की महामारी का आक्रमण हो गया. ईश्वर के अनुसार, एक दिन वे अवश्य इस्राएलियों के पाप लिए उनके पास आएंगे.

अल्लाह की मदद से उन्होंने फ़राओ को हराकर यहूदियों को आज़ाद कराया और मिस्र से एक नयी भूमि इस्राइल पहुँचाया । इसके बाद मूसा ने इस्राइल को अल्लाह द्वारा मिले "दस आदेश" दिये जो आज भी यहूदी धर्म का प्रमुख स्तम्भ है ।
1. माता-पिता का आदर करो

2. हत्या न करो

3.व्यभिचार न करो

4. चोरी न करो

5. झूठी गवाही न दो

६. एक ही ईश्वर है

७. छह दिन काम एक दिन आराम करो.

८.परस्त्री के पास न जाओ

9.दास, दासी और पशुओं की रक्षा करो

10. लालच मत करो

यहूदी धर्म के प्रमुख उपदेश:

यहूदी धर्म में धर्मानुयायियों के लिए कुछ उपदेश दिए गए हैं जो कि इस प्रकार हैं :

1. किसी पर अन्याय मत करो।

2. किसी का शोषण मत करो।

3. किसी से ब्याज मत लो, कम नफा लो।

4. किसी को भी मत सताओ।

5. गुलामों को गुलामी से मुक्त करो।

6. सदाचार का पालन करो।

7. लालच मत करो, झूठ मत बोलो।

8. ईश्वर सबसे बड़ा है, ईश्वर से प्रेम करो।

9. अपने भाई एवं सबका हित करो, मन वचन से कर्म करो।

10. अल्लाह ही ईश्वर है, उनका आदेश मानो।

11. प्रेम, करुणा, सत्य, ब्रह्मचर्य, श्रमनिष्ठ, दु:खी की सेवा सदाचार अपनाओ ये यहोबा ने कहा है।

यहूदी धर्म द्वारा बताई सात बुराइयां

1. घमंड से चढ़ी आंखें।

2. झूठ बोलने वाली जीभ।

3. निर्दोष का खून बहाने वाले हाथ।

4. अनर्थ कल्पना करने वाला मन।

5. बुराई की ओर बढऩे वाले पैर।

6. भाईयों के बीच फूट डालने वाले मानव।

7. झूठ बोलने वाला गवाह।

मूसा के उपदेशों में दो बातें मुख्य हैं : एक-अन्य देवी देवताओं की पूजा को छोड़कर एक निराकार ईश्वर की उपासना और दूसरी सदाचार के दस नियमों का पालन।

  • तौरात के अध्याय व्यवस्था विवरण 18 :18-19 में आया है कि "हे मूसा! मैं बनी इस्राईल के लिए उनके भाईयों ही में से तेरे समान एक नबी बनाऊँगा और अपने वचन (आदेश) को उसके मुँह में रख दूँगा। और वह उन से वही बात कहेगा जिसका मैं उसे आदेश दूँगा। जो आदमी उस नबी की बात नहीं मानेगा जो मेरे नाम पर बोलेगा तो मैं उस से और उसके क़बीले से इंतिक़ाम लूँगा।" ये शब्द आज तक उन की किताबों में मौजूद हैं, और उनके कथन "उनके भाईयों में से" यदि इस से अभिप्राय यह होता कि उन्हीं में से अर्थात् बनी इस्राईल में से होता तो वह इस प्रकार कहते कि: मैं उन्हीं में से उन के लिए एक नबी खड़ा करूँगा, जबकि उनके भाईयों में से कहा हैं जिसका मतलब है कि इसमाईल के बेटों में से। 
  • यह कथन पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के अलावा किसी और पर लागू नहीं होता है

Thursday, 5 May 2016

शबे-ए-मेराज की नमाज़

Shab e Meraj ki Namaz
Shab e Meraj ki kuch namaze ::::
1.Maahe Rajab ki 27vi shab ko 12
rakat namaz 3 salaam se padhe pehle
4 rakat me baad Surah Fateha ke
Surah Qadr 3 martaba har rakat me
padhe,
baad salaam ke 70 martaba baith kar
LA ILAHA IL’LALLAHUL MALIKUL
HAKKUL MUBIN padhe.
Dushri 4 rakat me baad Surah Fateha
ke Surah Nasr 3 martaba har rakaat
me padhe,
baad salaam ke baith kar 70 martaba
LA ILAHA IL’LALLAHUL MALIKUL
HAKKUL MUBIN padhe.
Tisri 4 rakat me baad Surah Fateha ke
Surah Ikhlaas 3 martaba har rakat me
padhe,
baad salaam baithkar 70 martaba
Surah Alam Nasrah padhe.
Phir Baargaah e Rabbul Izzat me dua
maange IN SHA ALLAH TA’ALA jo
hajaat hogi wo ALLAH PAK qabool
farmayega.
2. Maahe Rajab ki 27vi shab ko 20
rakat namaz 10 salaam se padhe har
rakaat me Surah Fateha ke baad
Surah Ikhlaas 1 dafa padhe.
IN SHA ALLAH TA’ALA jo koi ye namaz
padhe to ALLAH TA’ALA uske jaano
maal ki hifazat farmayega.
3. 27vi shab ko 4 rakat namaz 2
salaam se padhe har rakat me Surah
Fateha ke baad Surah Ikhlaas 27
martaba padhe,
baad salaam ke 70 martaba darood
paak padhe aur apne gunaho ki
magfirat talab kare
IN SHAA ALLAH TA’ALA parwar digaar
e aalam apne rehmat e kaamila se
uske gunah muaf farma kar uski
magfirat farmayega.
4.Maahe Rajab ki 27vi tarikh baad
namaz e zohar 4 rakat namaz ek
salaam se padhe.
Pehli rakat me baad Surah e Fateha
ke Surah Qadr 3 martaba,
Dusri me Baad Surah Fateha ke Surah
Ikhlaas 3 dafa,
Tisri me Baad Surah Fateha ke Surah
Falak 3 martaba,
aur chouthi me Baad Surah Fateha ke
Surah Naas 3 martaba pade.
Baad salaam ke darood paak 100
martaba aur Istegfar 100 martaba
padhe.
Ye namaz har murad ke liye IN SHAA
ALLAH TA’ALA bahot afzal hai.
(Book name as a refrence:
Baarah Mahino ki nafl Namaze
(Aukaatu salaat) ,Page No.17)

Shabe-E-Barat

Shab-e-Barat
Mid-Sha'ban two words, and the procession is made up of Shab, meaning night of Shab is where the procession would mean acquittal. According to the Islamic calendar month of the night once a year on the 14th of Sha`ban begins after sunset. For Muslims it is extremely virtue night (glory) is the night, the day all the Muslims of the world are worshiping Allah. They are praying and repent of your sins.
description
This week Arabia Lylatul Barah or Lylatun Nisfe SHABAN is known. Mid-Sha'ban called it India, Pakistan, Bangladesh, Iran, Afghanistan and Nepal are known.

References

शबे-ऐ-मेराज क्या है?

मेराज की रात अल्लाह तआला ने अपने महबूब नबी (स०अ०व्०) को आलमे दुनिया, आलमे बरजख, आलमे आखिरत और आलमे मलकूत की सैर कराते हुए अपनी बारगाह में बुलाया और इतना करीब किया और राज व नियाज की ऐसी बाते की कि तमाम अव्वलीन व आखिरीन फरिश्ते व जिन्न बल्कि अम्बिया व रसूल सब रश्क करते रह गए और तजल्लियाते इलाही की ऐसी दीद हुई कि उससे पहले किसी को हुई थी न इसके बाद किसी को होगी।

तमाम मखलूकात में यह एजाज सिर्फ आप (स०अ०व०) को हासिल हुआ है। एजाज के हर मौके पर रसूल (स०अ०व०) ने अपनी प्यारी उम्मत को याद रखा, राज व नियाज की बातों के बीच उम्मत का भी तजकिरा आया होगा। आप (स०अ०व०) ने तजल्लियाते इलाही का दीदार किया। अल्लाह तआला ने अपने महबूब को दरबारे तजल्ली में बुलाया ही था नवाजिश के लिए, बुलाकर हर ख्वाहिश पूरी की, उम्मत के लिए भी मेराज का तोहफा पेश किया।

यानी नमाज से नवाजा और फरमाया कि यही आप(स०अ०व०) की उम्मत की मेराज है। अव्वलन पचास वक्त की नमाजे फर्ज थीं फिर बाद में पांच नमाजे रह गईं। यह महज फजल खुदावंदी है कि हम नमाज पंजगाना की अदाएगी पर पचास वक्त की नमाजों का सबाब पाते हैं।

इस्लाम में नमाज की अहमियत और वकअत के लिए इतना ही काफी है कि वह इस्लाम के पांच सुतूनों में से एक अहम सुतून है। नबी करीम (स०अ०व०) ने फरमाया- कयामत में सबसे पहले नमाज के बारे में पूछा जाएगा। इरशादे नबवी है- यानी कयामत के दिन बंदे से उनके आमाल में सबसे पहले जिस चीज का हिसाब लिया जाएगा वह नमाज होगी।

यह अल्लाह और उसके नेक बंदे के बीच कुर्बत का सबसे बेहतरीन जरिया है। नबी करीम (स०अ०व०) ने फरमाया नमाजी जब नमाज पढ़ता है तो अपने रब से सरगोशी करता है, नमाज मोमिन की मेराज है आंखों की ठंडक, दिल की रौशनी, दिमाग की आसूदगी व राहत नमाज से हासिल होती है।

नमाज एत्तेहाद व इत्तेफाक और इताअत व फरमाबरदारी का अमली नमूना है। अरबी व अजमी, अमीर व गरीब, गुलाम व आका, शाह व भिखारी, ओहदेदार व बेओहदेदार, हाकिम व महकूम सब एक ही सफ मे खड़े हो जाते हैं, न कोई बंदा है और न कोई बंदा नवाज। नमाज हर बालिग पर लाजिम है।

इससे किसी को छुटकारा नहीं। सेहतमंद हो या बीमार, आलिम हो या जाहिल, शाह हो या भिखारी, साहबे दौलत हो या मुफलिस, हिन्दी हो सिंधी, अरबी हो या अजमी, मशरिकी हो या मगरिबी हर मुसलमान पर नमाज पंजगाना फर्ज है। सुकून व इत्मीनान की हालत में हो या जंग व जिदाल का खौफनाक और हौलनाक मंजर जिसमें तीरों की बारिश हो रही हो नेजो और तलवारों की बिजलियां चमक रही हों, लेकिन नमाज की सफ यहां भी कायम।

पांचो नमाजों को अपने अपने वक्तों में अदा करने से हर काम वक्त मुकर्ररा पर अंजाम देने की आदत हो जाती है और यह दोनों जहां में कामयाबी की निशानी है। पांचों नमाजों में जुमा और ईदैन में लोगों का इज्तिमा होता है जिसकी वजह से आपसी मोहब्बत व ताल्लुक एक दूसरे के हालात से वाकफियत और तमाम इज्तिमाई काम की अंजामदेही में आसानी हो जाती है।

अमीर व फकीर एक जगह जमा होते हैं और अमीरों में गरीबों, मोहताजों, यतीमों और बेवाओं पर तरस खाने और उनकी मदद करने का जज्बा पैदा होता है। नमाज हर वक्त अल्लाह की याद, आखिरत की फिक्र व तैयारी, हक पर कायम रहने, बातिल को मिटाने का फितरी जज्बा मोमिन में पैदा करती है।

यह गुनाहों और नाफरमानियों से बाज रखती है। अल्लाह तआला ने परेशानी की घड़ी में सब्र और नमाज के जरिए मदद चाहने की तलकीन की है।

बेशक नमाज के अन्दर यह बरकात व फैजानात मौजूद है। आज भी अगर कोई पूरे खुशूअ व खुजूअ के साथ नमाज की पाबंदी करे तो उसे इसी दुनिया में मेराज और तजल्लियाते इलाही नसीब हो जाए और अगर पूरी उम्मत को नमाज कायम करने की तौफीक मिल जाए तो उम्मत के अन्दर मौजूद तमाम रजायल दूर हो जाएं और उसको अपनी खोई हुई अजमत मिल जाए।

मेराज मुसलमानों के लिए एक अजीम इनाम भी है। मगर आज हम शबे मेराज में क्या करते हैं? अगर उनकी तफसीलात बयान की जाए तो सिवाए अफसोस के और कुछ नहीं होगा। हम शबे मेराज को सैर व तफरीह की रात समझते हैं। इसे कव्वाली, गजल और गपशप तक महदूद किए हुए हैं।

इतनी अहम व अजीम रात को हम यूं ही गुजार देते हैं। हमने बहुत से ऐसे लोगों को भी देखा है जिनका पूरा घर पांच वक्त की नमाज तो नहीं पढ़ता मगर शबे मेराज में सब नहा धोकर साफ कपड़े पहन कर रात भर तसबीह व नवाफिल पढ़ते रहते हैं। मुमकिन है वह इस रात की अहमियत को न समझते हों मगर उलेमा और दानिश्वराने कौम इस रात की अहमियत और तकाजे क्यों नहीं बताते? दरअसल शबे मेराज को हमने एक त्योहार समझ रखा है।

हम नबी करीम (स०अ०व०) के तरीके को नहीं समझते। सहाबा और बुर्जुगाने दीन के अमल को नहीं अपनाते। इस रिवायती अंदाज में इतनी अहम रात को त्योहार की तरह गुजार देते हैं यह मुसलमानों का तरीका नहीं। पांच वक्त की नमाज का अजीम तोहफा शबे मेराज में अल्लाह तआला ने अपने महबूब हजरत मोहम्मद (स०अ०व०) को दिया। क्या हम उस तोहफे को समझ सके। नमाज मोमिन की मेराज है, नमाज दीन का सुतून है क्या यह सब हुजूर का फरमान नहीं? फिर हम इसे क्यों नहीं मानते उस पर अमल क्यों नहीं करते।

तमाम मसायल का हल नमाज है, तमाम तरह की परेशानियों का इलाज नमाज है जिस घर के लोग नमाजी हैं उस घर में अल्लाह की रहमत व बरकत नाजिल होती है, आने वाली बलाएं टल जाती हैं, ईमान सलामत रहता है। हम नमाज नहीं पढ़ते हैं तो शबे मेराज मनाने का हक नहीं है। कितने अफसोस की बात है कि नमाज छोड़कर हम खुद दीन की बुनियादों को खोखला कर रहे हैं।

अल्लाह ने कुरआन में बार-बार नमाज कायम करने का हुक्म दिया है फिर भी हम नहीं पढ़ते। गोया अल्लाह और कुरआन के एहकाम को झुटलाते हैं फिर हम कैसे मुसलमान है? हम अगर वाकई मुसलमान बन जाएं, अल्लाह व उसके रसूल के एहकामात पर सख्ती से अमल करें तो हमारी जिंदगी में एक नया इंकलाब आएगा।

मगर अफसोस कि शैतान हमारे दिल व दिमाग पर इस तरह हावी है कि हम सब कुछ समझकर भी महसूस नहीं करते। हमारा एहसास मर चुका है, दिल सयाह ( काला) हो चुका है तो अच्छी बातें कहां से हमारे दिल व दिमाग में आएंगी। नवाफिल पढ़ रहे हैं तस्वीह पढ़ रहे हैं क्या यह अमल काबिले कुबूल होगा। अल्लाह का उसूल और उसका कानून बरहक है।

उसकी खिलाफवर्जी करके दिन रात अल्लाह-अल्लाह करते रहे कुछ नहीं होता जो तरीका बता दिया गया जिस तरीके पर चलकर नबी करीम (स०अ०व०) ने दिखा दिया है जब तक उसकी तकलीद नहीं करेंगे सब बेकार है। मुसलमानों को शोबाजी और दिखावे की दुनिया से अलग होकर अमल की दुनिया में आने की जरूरत है।

तभी दुनिया हमारे कदमों में होगी वरना हम दुनिया के कदमों में रहेंगे। जरूरत इस बात की है कि शबे मेराज के फलसफे को समझा जाए और फिर नमाज को अव्वलियत देकर पाबंदी की जाए। आज मुसलमान अपने मसायल के लिए दर-दर भटक रहा है कोई मोहताजगी की हालत में है कोई परेशानी की हालत में है।

किसी के घर बीमारी है किसी के घर आपसी झगड़ा है। इन तमाम मसायल का हल नमाज में है। मस्जिद जो अल्लाह का घर है वहां हम नहीं जाते गली मोहल्लों में घंटों एक दूसरे के साथ गपशप और दुनियावी बातों में मसरूफ रहेंगे मगर दस पन्द्रह मिनट का वक्त हमारे पास नमाज पढ़ने का नहीं है। अगर हम नमाज से गफलत करते रहे तो हमारा वजूद व शिनाख्त तक कुचल दी जाएगी।
शबे मेराज का तकाजा नमाज है।